रविवार, 14 जून 2009

ऑस्ट्रेलिया में नस्लवाद

आज जबकि एक ग्लोबल वर्ल्ड की बात हो रही है और पुरे विश्व को एक बड़े गाव के रूप में देखा जा रहा है तो ऐसे में इस तरह नस्लवादी घटनाये न सिर्फ़ मानवता के नाम पे कलंक है बल्कि ये शर्मनाक और चुनौतीपूर्ण भी है.....क्योकि आज जब हम राष्ट्रवाद , जातिवाद से ऊपर उठ के मानववाद की बात करते है तो ऐसी घटनाए हमारे वश्विक लक्ष्यों को और मानवतावादी प्रयासों को नुक्सान पहुचने वाली ही है,
ऑस्ट्रेलिया में जिस तरह न्रिशंश्तापूर्ण ढंग से भारतीय छात्रों पे हमले हुए है उनसे तो लगता है की उपनिवेशवादी समय की मानसिकता से ये राष्ट्र अभी भी बाहर नही निकल पाए है !
इसमे दोष किसे दे ये समझ नही आता , शायद नस्ल जाती धर्म रंग की इतनी गहरी छाप हमारे मन में बैठ चुकी है की ये चाहते न चाहते हुए भी जाहिर हो ही जाता है ! ऑस्ट्रेलिया की सरकार दोषी है क्योकि अगर मामले पर बहने बनने की जगह अगर तुंरत कार्यवाही की गई होती तो बात इतनी नही बिगड़ती ! भारत सरकार ने भी इस मामले पर कडा रुख नही अपनाया जो की दुखद है, वैसे भारत सरकार अक्सर देखने में आता है की विदेशो में भारतीयों पे होने वाले अत्याचारों पर कडा रुख नही अपनाती इसका उदाहरण हम मलेशिया में हुई घटनाओ में देख चुके है जिसमे हजारो हिंदू मन्दिर तोड़ दिए गए पर सरकार ने कोई भी कडा या संतोषजनक रुख नही दिखाया ! बहरहाल ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की घटनाओ ने देश को शर्मशार किया है !हम अपने देश में उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ने में असफल रहे है और हमारी व्यवस्था ऐसी है जिसमे विदेशो से मिली छोटी मोटी दिग्रीयो को भी सर माथे पर रखने की प्रवृत्ति है ! अपनी व्यवस्था को न सुधर पाने के कारन
अरबो रूपए विदेशो में फीस दे दी जाती है !वजह सिर्फ़ ये है की हमारी मानसिकता बन गई है की विदेश में जो मिले वही अच्छा होता है..... इसी मानसिकता से वे भी ग्रस्त है की हम विदेशी है हम श्रेस्ठ है याही नस्लवाद रंगभेद का मूल है ,...........
इसपर विचार करने की जरुरत भारत को भी है और और विश्व को भी ताकि एक वश्विक गाव का सपना पुरा हो सके
और विदेशो में पढने वाले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके,,,,,,

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